जबलपुर : मध्यप्रदेश के जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने हाल ही में एक सैन्य अधिकारी (Army Officer) के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म के मामले में बेहद महत्वपूर्ण और सख्त फैसला सुनाया है। अदालत ने अधिकारी के विरुद्ध दर्ज प्राथमिकी (FIR) को पूरी तरह से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि कानून का इस्तेमाल किसी को परेशान करने या दबाव बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। मामले की विस्तृत सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि आरोपी सेना के अधिकारी और शिकायतकर्ता महिला पुलिसकर्मी लंबे समय से एक-दूसरे के संपर्क में थे और उनके बीच शारीरिक संबंध पूरी तरह से आपसी सहमति (Consensual) पर आधारित थे। कोर्ट ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि महिला एक शिक्षित और कानून प्रवर्तन एजेंसी (पुलिस) का हिस्सा है, जिसे कानून की अच्छी समझ है; ऐसे में शादी का झांसा देकर लंबे समय तक यौन शोषण के आरोपों में तार्किक आधार की कमी दिखाई देती है। साक्ष्यों और परिस्थितियों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद, माननीय न्यायालय ने यह पाया कि जब दोनों के बीच विवाद शुरू हुआ या विवाह की बात नहीं बनी, तब दबाव बनाने के उद्देश्य से आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गई थी। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि आपसी सहमति से बने संबंधों को बाद में दुष्कर्म का रूप देना न केवल कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है, बल्कि यह आरोपी के करियर और मान-सम्मान को भी अपूरणीय क्षति पहुँचाता है। इस निर्णय के माध्यम से हाईकोर्ट ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि 'शादी के वादे' और 'सहमति' के बीच एक स्पष्ट अंतर है, जिसे कानूनी चश्मे से गहराई से देखना आवश्यक है ताकि न्याय की निष्पक्षता बनी रहे।