एक माह में ही नेपाल सरकार के गृहमंत्री ने दिया इस्तीफा, वित्तीय मामलों में फंसे
काठमांडु। नेपाल में जेन जी आंदोलन के बाद बनी नई बालेन सरकार को एक महीने का भी वक्त नहीं हुआ है और देश के गृहमंत्री सुदन गुरुंग ने इस्तीफा दे दिया है। यह वही सुदन गुरुंग हैं, जो जेन जी आंदोलन में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक चेहरा बनकर उभरे थे। भ्रष्टाचारियों के घर से एक-एक पाई निकाल लाने जैसे बयानों की खूब चर्चा हुआ करती थी। नेपाल सरकार में गृहमंत्री बनने के बाद भी उनकी पहली टिप्पणी यही थी कि मैं भ्रष्ट लोगों को दुनिया के सामने लाऊंगा और बताऊंगा कि नेपाल में कैसे बदलाव हो रहे हैं। उनका कहना था कि यदि उन्होंने कुछ गलती की होगी तो भ्रष्टाचार के मामले में मैं अपने पिता तक को नहीं बख्शूंगा। ऐसे में बड़ा सवाल है कि गुरुंग आखिर खुद कैसे वित्तीय मामलों में फंस गए।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इसकी वजह यह है कि मनी लॉन्ड्रिंग की जांच में घिरे एक कारोबारी के साथ उनके रिश्तों की चर्चा है। उन पर आरोप है कि उस कारोबारी के बिजनेस में सुदन गुरुंग ने कुछ निवेश किया है यानी हिस्सेदारी रखते हैं। यह विवाद इतना बढ़ा कि सुदन गुरुंग को इस्तीफा देना पड़ा। इसके अलावा उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में जांच भी कराई जा सकती है। कारोबारी दीपक भट्ठा का नाम बीते कुछ सालों में चर्चा में रहा है और उनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग की जांच चल रही है। ऐसे में उनसे संबंधों के चलते सुदन गुरुंग को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी है।
रिपोर्ट के मुताबिक मामला यहीं खत्म नहीं हुआ है। पूर्व सचिव शारदा प्रसाद त्रितल और कई अन्य लोगों ने मांग की है कि इस्तीफा ही काफी नहीं है। इस मामले में गहन जांच की जरूरत है। शारदा प्रसाद ने कहा कि यदि सुदन गुरुंग के खिलाफ कुछ नहीं पाया जाता तो फिर उन्हें क्लीन चिट भी मिलनी चाहिए। इसके अलावा गलती पाई जाए तो जांच आगे बढ़नी चाहिए। इस मामले में जांच की मांग तेज हो रही है तो संभव है कि गुरुंग अगले कुछ दिनों में घिर सकते हैं।
माना जा रहा है कि नेपाल पीएम बालेंद्र शाह भी दबाव में हैं और उन्होंने ही इस्तीफा मांगा था। ऐसा इसलिए क्योंकि इस्तीफा देने से पहले सुदन गुरुंग आपदा प्रबंधन विभाग की एक बैठक में थे और मॉनसून से पहले की तैयारी का जायजा ले रहे थे। यह बैठक किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई थी और सुदन गुरुंग बीच में ही उठ गए। इसके बाद वह सीधे पीएम आवास से निकल गए और फिर मंत्री परिषद के लोगों से मिले। आधे घंटे के बाद उन्होंने सार्वजनिक तौर पर इस्तीफे का ऐलान कर दिया।
इससे स्पष्ट है कि वह पीएम बालेन शाह के कहने पर ही बैठक से निकले थे और उन्हें इस्तीफा देकर आए। हालांकि अब भी वह खुद को निर्दोष बता रहे हैं और क्रांति की गरिमा बनाए रखने की बात कर रहे हैं। उनका कहना है कि जिस शुचिता और ईमानदारी वाले शासन की चाह लेकर आंदोलन हुआ और 46 युवा उसमें मारे गए। उसका अपमान नहीं होना चाहिए। आंदोलन से बनी सरकार की गरिमा बनी रहनी चाहिए। इसलिए निष्पक्ष जांच के उद्देश्य से मैं इस्तीफा दे रहा हूं।

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