जयपुर: राजस्थान की साढ़े सात करोड़ जनता के दशकों पुराने संघर्ष को आज बड़ी जीत मिली है। देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने एक क्रांतिकारी आदेश जारी करते हुए राजस्थान सरकार को निर्देशित किया है कि वह प्रदेश के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में राजस्थानी भाषा को एक विषय के रूप में अनिवार्य रूप से शामिल करने के लिए ठोस नीति तैयार करे। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने सरकार के अब तक के ढुलमुल रवैये पर कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा देना उनका संवैधानिक अधिकार है।

1. स्कूलों के लिए कड़ा निर्देश: सरकारी और प्राइवेट दोनों पर लागू होगा नियम

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राजस्थानी भाषा को केवल सरकारी स्कूलों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। कोर्ट के आदेशानुसार, सरकार को एक समयबद्ध योजना बनानी होगी जिसके तहत शुरुआती स्तर (फाउंडेशनल) से लेकर उच्च स्तर तक राजस्थानी को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा। अदालत ने साफ कहा कि जब विश्वविद्यालयों में यह भाषा पढ़ाई जा रही है, तो स्कूली स्तर पर इसे रोकने का कोई तार्किक आधार नहीं है। अब प्रदेश के हर निजी और सरकारी स्कूल को इस आदेश का पालन करना अनिवार्य होगा।

2. REET परीक्षा और रोजगार के खुलेंगे नए रास्ते

अदालत के इस रुख का सीधा असर राजस्थान शिक्षक पात्रता परीक्षा (REET) पर भी पड़ेगा। याचिकाकर्ताओं की मांग पर संज्ञान लेते हुए संकेत मिले हैं कि अब शिक्षक भर्ती के सिलेबस में राजस्थानी भाषा को प्रमुखता दी जा सकती है। इससे न केवल स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, बल्कि स्कूलों में इस विषय को पढ़ाने के लिए विशेषज्ञों की भर्ती का रास्ता भी साफ होगा। यह कदम राज्य की नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होगा।

3. 8वीं अनुसूची का इंतजार खत्म, अस्मिता की हुई जीत

लंबे समय से राजस्थानी भाषा को मान्यता देने के मार्ग में संविधान की 8वीं अनुसूची का पेच फंसा हुआ था। सरकार अक्सर यह तर्क देती थी कि केंद्र से मान्यता मिलने के बाद ही इसे स्कूलों में लागू किया जा सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि शैक्षणिक स्तर पर भाषा को बढ़ावा देने के लिए संवैधानिक अनुसूची का इंतजार करना जरूरी नहीं है। कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट के पुराने फैसले को पलटते हुए इसे 'अस्मिता और अधिकार' का मामला बताया है। अब सितंबर 2026 में सरकार को इस आदेश पर अपनी रिपोर्ट पेश करनी होगी।